Thursday, February 7, 2013

रूद्राक्ष


एंव अग्नि हवन की 5 बार दो मुखी रूद्राक्ष दो मुखी रूद्राख गौ हत्या से लगने वाले पाप से मुक्ति दिलाने वाला होता है। यह रूद्राक्ष अपने-आप में आलौकिक शक्ति धारण किये रहता है। द्विमुखी रूद्राक्ष को शरीर के किसी भी अंग में धारण से मानसिक शन्ति एंव पारिवार में आपसी प्रेम सौहार्द्ध बना रहता है। यदि कार्य व्यापार में निरन्तर हानि हो रही है, तो दो मुखी रूद्राक्ष धारण करने से लाभ मिलता है। मन, बुद्धि, विवेक पर इस रूद्राक्ष का विशेष प्रभाव रहता है। जिन जाताकों के वैवाहिक जीवन में आपसी अनबन की स्थिति बनी रहती है तो वह लोग पति पत्नी दोनों को दो मुखी रूद्राक्ष भिमन्त्रित करके गले में धारण करने से शीघ्र ही मतभेद दूर होकर उनमें एकता परस्पर प्रेम की भावना बलवती होने लगती है। जिन युवक-युवितियों के विवाह में बिलम्ब या बाधा रही है, उन्हे यह रूद्राक्ष धराण करने से शुभ परिणाम मिलते है। दोमुखी रूद्राक्ष धारण करने से चन्द्र ग्रह से सम्बन्धित दोष भी दूर हो जाते है। धारण विधि- किसी भी मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी के दिन ताम्रपाद में बेल पत्र रखकर, उसके उपर द्विमुखी रूद्राक्ष रखकर कुश या बेल पत्र से शुद्ध जल से, 11 बार निम्न मन्त्र से- ' नमस्ते देवदेवाय महादेव मौलिने। जगद्धात्रे सवित्रे शंकराय शिवाय ''।। जल छिड़कर तत्पश्चात दूध छिड़के। फिर गंगा जल से परिमार्जित कर रूद्राक्ष को ताम्रपाद में रख दें। तीसरे दिन पूर्णमासी को उसी भांति सामने रखकर गंगाजल से स्नान करायें। उसके पश्चात हवन कुण्ड में अष्ठांग हवन सामग्री से 108 बार '' नमः शिवाय'' से स्वाहा करते हुये हवन करना चाहिए। हवन के बाद रूद्राक्ष का श्रद्धापूर्वक प्रार्थना करें। प्रार्थना के बाद रूद्राक्ष को माथे से स्पर्श से कराकर धारण करना चाहिए। उपरोक्त विधि से शुद्ध करके रूद्राक्ष को धारण करने पर आशा के अनुरूप लाभ प्राप्त होगा।

Read more at: 
http://hindi.oneindia.in/astrology/2012/importance-of-do-mukhi-rudraksha-in-
तीनमुखी रूद्राक्ष अग्नि का स्वरूप माना जाता है। यह रूद्राक्ष विध्वंसात्मक प्रवृत्तियों को नष्ट करके, रचनात्मक एंव सृजनात्मक प्रवृत्तियों में वृद्धि करता है। तीनमुखी रूद्राक्ष को शरीर में धारण करके निम्न प्रकार के लाभ प्राप्त किये जा सकते है- 1- परस्त्रीगमन से उत्पन्न दोषों को दूर करता है। 2- ईष्र्या, घृणा, द्वेश आदि दुष्प्रवृत्तियों को दूर करके सदबुद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है। 3- तीनमुखी रूद्राक्ष को रात्रि में किसी ताम्रपाद में जल भरकर उसमें रूद्राक्ष डाल दें। प्रातः काल उठकर उस जल को ग्रहण करने से, पेट के रोग, सूजन, प्लीहा तथा मलेरिया आदि रोगों में लाभ मिलता है। 4- तीनमुखी रूद्राक्ष को दाहिनी भुजा में बाधने पर, मंगल से सम्बन्धित दोषों का निवारण होता है। 5- जिन व्यक्तियों को क्रोध अधिक आता है, उन्हे तीनमुखी रूद्राक्ष धारण करने से लाभ मिलता है। 6- तीनमुखी रूद्राक्ष धारण करने से महिलाओं के मासिक धर्म से सम्बन्धित रोगों में लाभ मिलता है। 7- अग्नि तत्व प्रधान तीनमुखी रूद्राक्ष को धारण करने से मणिपुर चक्र शुद्ध हो जाता है, जिससे वाणी व्यक्तित्व में आकर्षण उत्पन्न होता है। 8- तीनमुखी रूद्राक्ष धारण करने से बेरोजगार व्यक्तियों को शीघ्र ही रोजगार के अवसर उपलब्ध होते है। धारण विधि- तांबे के पात्र में लाल चन्दन या रोली से, शमी की लकड़ी अथवा अनार की लकड़ी से त्रिकोण बनाकर उसके मध्य " रं " बीज लिखे। " रं " बीजाक्षर के उपर तीनमुखी रूद्राक्ष को गंगाजल से शुद्ध करके रखें। उसके उपर एक बेल पत्र तथा लाल रंग के पुष्प रखकर निम्न मन्त्र से- हूं रूद्राय तेजस् अधिपते विद्याकलात्मने हूं फट स्वाहा'' का 11 बार उच्चारण करके जल छिड़कना चाहिए। हवन मन्त्र- 1- अग्नये स्वाहा, 2- रं अग्र्विर्चसे स्वाहा, 3- ह्रीं सूर्योज्योतिज्र्योति अग्निर्वर्चसे स्वाहा, 4- ह्रां दिवे स्वाहा, 4- अग्ने ब्रतपते सूर्यो अग्निः अग्निः सूर्य जातवेदसे स्वाहा। उपर लिखे पांचों मन्त्रों से पांच -पांच बार आहूतियां देनी चाहिए। यह हवन किसी भी शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी से पूर्णमासी तक नित्य करने के बाद रूद्राक्ष को मुठ्ठी में दबाकर " नमः शिवाय " मन्त्र से 11 बार जप करके दाहिनी भुजा या गले में धारण करने से चमत्कारिक लाभ मिलता है।

चारमुखी रूद्राक्ष साक्षात ब्रहमा का स्वरूप माना गया है। यह मनुष्य की हत्या के पाप को दूर करने में सक्षम माना जाता है। चारमुखी रूद्राक्ष को शरीर में धारण करके निम्नलिखित प्रकार की समस्याओं से छुटकारा पाया जा सकता है- 1- चारमुखी रूद्राक्ष आत्मघाती प्रयासों को विफल करने में सक्षम होता है। 2- सिर दर्द, पागलपन, तनाव क्रोध आदि सभी प्रकार की समस्याओं को दूर करने में चारमुखी रूद्राक्ष कारगर सिद्ध होता है। 3- नकारात्मक सोंच, मायूसी, आलस्य, कायरता आदि अनेक प्रकार की व्याधियों को समाप्त कर जीवन सुखमय बनाता है। 4- चारमुखी रूद्राक्ष को शरीर में धारण करने से आत्म-विश्वास एंव संकल्प शक्ति बलवती होती है। 5- बुध ग्रह से जनित दोषों को दूर करने में चारमुखी रूद्राक्ष को धारण करने से लाभकारी परिणाम मिलते है। 6- व्यापार व्यवसाय में प्रगति के लिए चारमुखी रूद्राक्ष को पूजन कक्ष में रखकर नित्य पूजन करने से लाभ मिलता है। 7- पत्रकार, लेखक, सम्पादक, प्रकाशन, कवि, आदि के पेशे से जुड़ लोगों के लिए चारमुखी रूद्राक्ष पहनना फायदेमन्द होता है। 8- जिन बच्चों का पढ़ने में मन नहीं लगता, उन्हे चारमुखी रूद्राक्ष को लाल धागे में शुद्ध करके गले में धारण करना चाहिए। धारण विधि- किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी और चतुर्दशी दोनों दिन शिवलिंग से स्पर्श कराते हुए चारमुखी रूद्राक्ष को शिवलिंग के समीप रखकर "नमः शिवाय" मन्त्र से शिवलिंग तथा रूद्राक्ष दोनों को एक साथ स्नान करायें। तथा चन्दन, धूप, दीप से पजन करके, कुश से रूद्राक्ष को जल से अभिसिंचित करते हुये निम्न मन्त्र का 11 बार का उच्चारण करते हुए दोनों दिन अपेहि मनसस्पतेयक्राम परश्चर। परोनिर्ऋत्या चक्ष्व बहुधा जीवितो मनः।। जलाभिषेचन करने के बाद पूर्णिमा के दिन निम्न मन्त्र- हौं जूं सः माम् पालय पालय'' से 10' बार आहूतियां दें। हवन के पश्चात ' नमः शिवाय जपते हुए रूद्राक्ष को हवन कुण्ड की 7 बार परिक्रमा लगाकर धारण करना चाहिए।
Next »« Previous
पाँच मुखी रूद्राक्ष का साक्षात स्वरूप कलाग्नि रूद्र है। इस रूद्र्राक्ष की प्रशंसा एंव महत्ता शास्त्रों में वर्णित हैं। पाँचमुखी रूद्राक्ष को धारण करके अनेक प्रकार की व्याधियों से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। जो निम्नलिखित हैं- 1-पाँचमुखी रूद्राक्ष को शरीर में धारण करनें से व्यक्ति में जीवन के प्रति संघर्ष धैर्य की क्षमता में वृद्धि होती है। 2-किसी व्यापक समस्या में उलझे मनुष्यों को पाँचमुखी रूद्राक्ष धारण करने से समस्याओं से छुटकारा मिलता है। 3- जो व्यक्ति अपने मन की बात कहने में संकोच करते है अथवा संकोची स्वभाव के होते है। ऐसे लोगों को पाँचमुखी रूद्राक्ष धारण करने से उनकी प्रतिभा व्यक्तित्व में निखार आता है। 4- जो लोग अधैर्य या जल्दबाजी में गलत निर्णय ले लेते है, और बाद में अफसोस करते है। ऐसे लोगों को पाँचमुखी रूद्राक्ष करने से लाभ मिलता है। 5- राजनीति से जुड़े व्यक्तियों को पाँचमुखी रूद्राक्ष पहनने से उनके नेतृत्व में गजब का निखार आता है। 6- बृहस्पति ग्रह से जनित दोषों के निवारण हेतु पाँचमुखी रूद्राक्ष धारण करना काफी कारगर सिद्ध होता है। 7-हाईब्लड प्रेशर के रोगियों को पाँचमुखी रूद्राक्ष को चांदी में जड़वाकर कण्ठ में धारण करने से उच्च रक्त चाप नियन्त्रित रहता है। धारण विधि- किसी भी महीने की शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा इन तीनों दिन में पाँचमुखी रूद्राक्ष को शिवलिंग के साथ रखकर गंगा जल और कुश से निम्न मन्त्र- "नमः शिवाय" से जल छिड़के। तत्पश्चात चन्दन का तेल लगाकर मन्त्र 1 माला का जाप करें। हवन मन्त्र- ''ओइम् भूर्भवः स्वः त्रयम्ब यजामहे सुगिन्धं पुष्टिवर्धनम्। उव्र्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मा मृतात् ओइम् भूर्भव स्वः।। इस मन्त्र से 11 बार स्वाहा बोलकरप्रदिक्षणा करके पाँचमुखी रूद्राक्ष को धारण करने से अवश्य लाभ मिलता है।


No comments:

Post a Comment