छहमुखी रुद्राक्ष कार्तिकेय भगवान का स्वरुप है। इस रुद्राक्ष को दाहिनी भुजा में बाँधना अति उत्तम माना जाता है। छहमुखी रुद्राक्ष को धारण करके निम्न प्रकार के लाभों को अर्जित किया जा सकता है। 1- ज्ञान व स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए छहमुखी रुद्राक्ष को धारण करना हितकर रहता है। 2- जिन जातको के आत्म-विश्वास में कमी है, जिसके कारण उन्हें कोई कार्य करने से पूर्व घबराहट होने लगती है। ऐसे लोगो को यह रुद्राक्ष धारण करने से फायदा होता है। 3- नकारात्मक ऊर्जा अथवा भूत-प्रेत बाधा को दूर करने के लिए छहमुखी रुद्राक्ष धारण करना लाभकारी रहता है। 4- ह्रदय की दुर्बलता एवं नेत्र विकारों से सम्बन्धित रोगों को दूर करने के लिए छहमुखी रुद्राक्ष धारण करना अत्यन्त लाभकारी रहता है। 5- लव मैरिज की चाहत रखने वाले लोग छहमुखी रुद्राक्ष धारण करके सफलता अर्जित कर सकते है। 6-महिलाओं के गुप्त रोगों को दूर करने में छहमुखी रुद्राक्ष सक्षम माना जाता है। 7- जन्म पत्री में शुक्र ग्रह के पीडि़त होने पर छहमुखी रुद्राक्ष को दाहिनी भुजा में बाँधने पर लाभ मिलता है। धारण विधिः- किसी माह की त्रयोदशी तिथि को किसी ताम्रपात्र पर फूल, बेल-पत्र रखकर उसके ऊपर छहमुखी रुद्राक्ष को रखे। उसके बाद ''ऊँ गं गणपते नमः'' पढ़कर कुश से जल छिड़के। तत्पश्चात पूर्णमासी के दिन शिवलिंग के सामने रखकर ''ऊँ शिवाय नमः सुताभ्यां नमः'' मन्त्र से हवन करे और उसके बाद ''शिवाय नमः शिव सुताभ्यां नमः'' पढ़ते हुए अग्नि की पाँच बार परिक्रमा करके कण्ठ या दाहिनी भुजा में लाल धागे में धारण करें।
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सातमुखी रुद्राक्ष को सप्त माता एवं सप्त ऋषियों का प्रतीक माना जाता है। इस रुद्राक्ष में सप्त ऋषियों का प्रतीक माना जाता है। इस रुद्राक्ष में सप्तमाताओं की शक्तियाँ निहित होती है। सातमुखी रुद्राक्ष को धारण करके अनेक प्रकार के लाभ प्राप्त करके सुखमय एवं समृद्धिशाली जीवन गुजारा जा सकता है। 1- सातमुखी रुद्राक्ष पहनने से प्रत्येक क्षेत्र में विजय प्राप्त होती है तथा यश व कीर्ति में वृद्धि होती है। 2- सातमुखी रुद्राक्ष धारण करने से आर्थिक स्थिति में मजबूती आती है, एवं मन शान्त रहता है। 3- व्यवसायी वर्ग के लिए सप्तमुखी रुद्राक्ष धारण करना अत्यन्त लाभकारी सिद्ध होता है। 4- सातमुखी रुद्राक्ष पहनने से गणेश व लक्ष्मी जी की विशेष कृपा बनी रहती है, जिसके कारण घर व परिवार में सुख व समृद्धि बनी रहती है। 5- नौकरी वाले जातक यदि सातमुखी रुद्राक्ष धारण करते है, तो उनके कैरियर में प्रगति होती है तथा उनका बॉस काफी प्रभावित रहता है। 6- स्नायु तन्त्र से सम्बन्धित रोगों में सातमुखी रुद्राक्ष धारण करने से लाभ मिलता है। 7- सातमुखी रुद्राक्ष को पहनने से शनि ग्रह से सम्बन्धित दोषों जैसे साढ़ेसाती, ढैय्या आदि का शमन होता है। धारण विधिः- किसी भी मास की शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी से पूर्णिमा तक तीनो दिन गंगाजल में केसर दूध मिलाकर निम्न मन्त्र से- ''ऊँ ऐं हीं श्री क्लीं हूं सौः जगत्प्रसूतये नमः'' से सातमुखी रुद्राक्ष पर जल छिड़के। इसके बाद गंध अक्षत, दूर्वा, पुष्प, बेल-पत्र, धतूरा चढ़ाकर विधिवत् पूजन करें। तत्पश्चात् निम्न मन्त्र से ''ऊँ ऐं हीं श्रीं क्लीं हूं सौः जगत्प्रसूयते'' से 108 बार हवन करना चाहिए। और 7 बार हवन-अग्नि की परिक्रमा करके सातमुखी रुद्राक्ष को गले या भुजा में धारण करें।
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यह रूद्राक्ष अष्ट देवियों का स्वरुप माना जाता है। इसे धारण करने से आठ देवियों की विशेष कृपा बनी रहती है। आठमुखी रुद्र्राक्ष पहनने से विभिन्न प्रकार के संकटों को दूर किया जा सकता है। 1-जिन जातकों के कोर्ट- कचहरी में मुकदमें चल रहे है ऐसे लोगों को आठमुखी रुद्राक्ष धारण करने से शीघ्र ही विजय मिलती है। 2- आठमुखी रुद्राक्ष शत्रुओं का नाश करने में काफी सक्षम होता है। अतः जो लोग अपने शत्रुओं से परेशान रहते है, उन्हें यह रुद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिए। 3-साहस, आत्मविश्वास और पराक्रम से भरपूर आठमुखी रुद्राक्ष को उन लोगों को अवश्य पहनना चाहिए जो मनुष्य शारीरिक व मानसिक रुप से कमजोर रहते है। 4- जिस परिवार में अकाल मृत्यु या दुर्घटनाएं प्रायः होती रहती है। उस घर में आठमुखी रुद्राक्ष की विधिवत् पूजा करने से लाभ होता है। 5- जिन जातकों को कमर या रीढ़ की हड्डी से सम्बन्धित कोई समस्या बनी रहती है, उन्हें रेशमी धागे में आठमुखी रुद्राक्ष को धारण करने से लाभ मिलता है। 6-यह रुद्राक्ष प्रतिकूल परिस्थिति को अनुकूल बनाने में काफी प्रभावशाली साबित होता है। 7-राहु का दुष्प्रभाव दूर करने के लिए आठमुखी रुद्राक्ष को गले या भुजा में धारण करने से राहु का दोष समाप्त हो जाता है। धारण विधिः-किसी मास की शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी से लेकर पूर्णमासी तक विधिवत् पूजन करना चाहिए। हल्दी के चूर्ण को घोलकर अनार की कलम में ताम्रपत्र पर षणकोण यन्त्र बनाकर उसके मध्य में इस मन्त्र "श्रीं गलौं फट् स्वाहा" को लिखे । इसके बाद "ऊँ सर्वशक्ति कमलासनाय नमः" मन्त्र को पढ़ते हुए पुष्प अक्षत रखकर गंगाजल से परिमार्जित अष्ठमुखी रुद्राक्ष को समर्पित करे । गंगाजल में केसर, गोरोचन व दूध मिलाकर निम्न मन्त्र ऊँ गं गणधिपते नमः से रुद्राक्ष का अभिषेक करें। हवन मन्त्र -ऊँ श्रीं ग्लौं फट्- स्वाहा -ऊँ हूं ग्लौं फट्- स्वाहा -ऊँ हीं ग्लौं फट्- स्वाहा -ऊँ क्लीं ग्लौं फट्- स्वाहा -ऊँ स्त्रीं ग्लौं फट्- स्वाहा -ऊँ गं ग्लौं फट्- स्वाहा -ऊँ ग्लौं फट्- स्वाहा उपरोक्त सभी मन्त्रों से 5-5 बार स्वाहा बोलकर हवन करना चाहिए। तत्पश्चात् हवन अग्नि की 7 बार परिक्रमा करके रुद्राक्ष धारण करना चाहिए।
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9 मुखी रुद्राक्ष को नवदुर्गा का स्वरुप माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि यह रुद्राक्ष पहनने से नवदुर्गा की शक्तियाँ आपकी रक्षा करती है। नौमुखी रुद्राक्ष धारण करने से अनेक प्रकार के लाभ प्राप्त करके जीवन को सुखमय बनाया जा सकता है। 1- इस रुद्राक्ष के पहनने से आनन्द एवं मंगल का वातावरण परिवार में बना रहता है। 2- विपत्ति, दीनता, रोग आदि अनेक प्रकार की समस्याओं को आठमुखी रुद्राक्ष धारण करके दूर किया जा सकता है। 3- जो लोग नौकरी में अत्यधिक श्रम करते है, उसके बावजूद भी उनकी पदोन्नति होते-होते रुक जाती है। ऐसे लोगों को नौमुखी रुद्राक्ष पहनने से उनके करियर व नौकरी में पदोन्नति होने की सम्भावना बढ़ जाती है। 4- जो छात्र अपने कठिन परिश्रम के बल पर परीक्षा उत्तीर्ण करके साक्षात्कार देते है, किन्तु उन्हें सफलता नहीं मिलती है। ऐसे छात्र नौमुखी रुद्राक्ष धारण करके सफलता अर्जित कर सकते है। 5- चिड़चिड़े व क्रोधी स्वभाव वाली महिलाओं को नौमुखी रुद्राक्ष पहनने से मन शान्त रहता है। 6- जो बच्चे स्वभाव से जिद्दी, गुस्सैल, शरारती आदि है। उन्हें नौमुखी रुद्राक्ष चाँदी में जड़वाकर लाल धागे में गले में पहनाने से सकारात्मक परिणाम सामने आते है। 7- केतु ग्रह से सम्बन्धित दोषों का शमन करने के लिए नौमुखी रुद्राक्ष धारण अत्यन्त लाभकारी सिद्ध होता है। धारण विधिः-किसी भी मास की शुक्ल पक्ष त्रयोदशी से पूर्णमासी तक लगातार तीन दिन तक गंगाजल, केसर, बेलपत्र आदि से निम्न मन्त्र- ''ऊँ ऐं हीं श्रीं क्लीं चामुण्डादैत्यै नमः'' से रुद्राक्ष को जलाभिषेक करना चाहिए। फिर इसी मन्त्र को पढ़ते हुये चमेली का तेल रूद्राक्ष में लगाना चाहिए। तत्पश्चात् प्रार्थना करने के बाद निम्न मन्त्र -''ऊँ ऐं हीं श्रीं क्लीं चामुण्डा देत्यै नमः'' से अधिक से अधिक 108 बार और कम से कम नौ बार हवन करना चाहिए। तत्पश्चात् अग्नि की नौ बार परिक्रमा करके नौमुखी रुद्राक्ष को धारण करना चाहिए।Read more at: http://hindi.oneindia.in/astrology/2012/importance-of-8-mukhi-rudraksha-in-astrology-220281.html
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